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जिंदगी गुजर गई सबको खुश करनेमें ... जो खुश हुए वो अपने नहीं थे ... जो अपने थे वो कभी खुश नहीं हुए ...

Friday, November 22, 2019

Good Thoughts M



Yes, I am changing

Yes, I am changing.
After loving my parents, my siblings, my spouse, my children, my friends, now I have started loving myself.

Yes, I am changing.
I just realised that I am not “Atlas”. The world does not rest on my shoulders.

Yes, I am changing.
I now stopped bargaining with vegetables and fruits vendors. After all, a few Rupees more is not going to burn a hole in my pocket but it might help the poor fellow save for his daughter’s school fees.

Yes, I am changing.
I pay the taxi driver without waiting for the change. The extra money might bring a smile on his face. After all he is toiling much harder for a living than me.

Yes, I am changing.
I stopped telling the elderly that they've already narrated that story many times. After all, the story makes them walk down the memory lane and relive the past.

Yes, I am changing.
I've learnt not to correct people even when I know they are wrong. After all, the onus of making everyone perfect is not on me. Peace is more precious than perfection.

Yes, I am changing. 
I give compliments freely and generously. After all it's a mood enhancer not only for the recipient, but also for me.

Yes, I am changing.
I've learnt not to bother about a crease or a spot on my shirt. After all, personality speaks louder than appearances.

Yes, I am changing.
I walk away from people who don't value me. After all, they might not know my worth, but I do.

Yes, I am changing.
I remain cool when someone plays dirty politics to outrun me in the rat race. After all, I am not a rat and neither am I in any race.

Yes, I am changing.
I am learning not to be embarrassed by my emotions. After all, it's my emotions that make me human.

Yes, I am changing.
I have learnt that its better to drop the ego than to break a relationship. After all, my ego will keep me aloof whereas with relationships I will never be alone.

Yes, I am changing.
I've learnt to live each day as if it's the last. After all, it might be the last.

Yes, I am changing.
I am doing what makes me happy. After all, I am responsible for my happiness, and I owe it to me.

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Love Yourself

When you are 50
you are like a basketball,
everyone wants you,
because you can still
earn an income or
be an unpaid babysitter.

When you are 60, 
you are like a volleyball,
if you can still work
everyone will aim for you,
never ending babysitting job.

When you are 70,
you are like a football,
A will kick it to B,
B will kick it to C,
C will kick it to D,
Children are grown up
and you have grown old,
no one wants you any more.

When you are 80,
you are like a golf ball,
a swing of the club....
wherever you land is
where you perhaps will
end your life !!

Therefore, when you are in your fifties and sixties,
pay attention and take good care of your own self and do not let yourself be tortured by life or other people. 

Feel free to buy what you want and eat all you want; do not hesitate! Do not be stingy to yourself.

Or....by the time you realise, you'd be gone into the golf ball era...!! ,
Love yourself and be kind to yourself.

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Please look for me now!

When I'm dead.
​Your tears will flow
​But I won't see
Cry with me now instead!​

​You will send flowers,..​
​But I won't see
Send them now instead.

​You'll say words of praise,..​
​But I won't hear..​
Praise me now instead!​

​You'll forget my faults,....​
​But I won't know.....​
Forget them now, instead!​

​You'll miss me then,...​
​But I won't feel...
​Miss me now, instead​.

​You'll wish...
You could have spent more time with me,...​
You won't
​Spend it now instead!​

​When you hear I'm gone, you'll find your way to my house to pay condolence but we haven't even spoken in years....​
​Please look for me now!!​

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महाभारत 

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फ़टे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हए थे,*

वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी. गिद्ध, कुत्ते, सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था अकेला.

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, "प्रणाम पितामह"

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी। बोले, "आओ देवकीनंदन... स्वागत है तुम्हारा. मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था"

कृष्ण बोले, " क्या कहूँ पितामह! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप"

भीष्म चुप रहे. कुछ क्षण बाद बोले, "पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव? उनका ध्यान रखना, परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है"
कृष्ण चुप रहे.

भीष्म ने पुनः कहा, " कुछ पूछूँ केशव? बड़े अच्छे समय से आये हो, सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय।"

कृष्ण बोले- कहिये न पितामह!

एक बात बताओ प्रभु! तुम तो ईश्वर हो न.. कृष्ण ने बीच में ही टोका, "नहीं पितामह! मैं ईश्वर नहीं। मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह, ईश्वर नहीं।"

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े। बोले, "अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण, सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा। पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया, अब तो ठगना छोड़ दे रे..."
कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले, " कहिये पितामह!"
भीष्म बोले, "एक बात बताओ कन्हैया! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या?"

- "किसकी ओर से पितामह? पांडवों की ओर से?"

- "कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया, पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था? आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या? यह सब उचित था क्या?"

- इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह! इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया। उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम, उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन, मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह!

- "अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है। मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा

कृष्ण!" - "तो सुनिए पितामह! कुछ बुरा नहीं हुआ, कुछ अनैतिक नहीं हुआ। वही हुआ जो हो होना चाहिए।"

- "यह तुम कह रहे हो केशव? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है? यह क्षल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया? "

- "इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है। हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है। राम त्रेता युग के नायक थे, मेरे भाग में द्वापर आया था। हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह।"

-" नहीं समझ पाया कृष्ण! तनिक समझाओ तो..."

-"राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह! राम के युग में खलनायक भी 'रावण' जैसा शिवभक्त होता था। तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण और कुम्भकर्ण जैसे सन्त हुआ करते थे। तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे।

उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था। इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया।

किंतु मेरे युग के भाग में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं। उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह। पाप का अंत आवश्यक है पितामह, वह चाहे जिस विधि से हो।"

- "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा?"

-"भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह। कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा। वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा, नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा।

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह! तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय। भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह।"

-"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव? और यदि धर्म का नाश होना ही है, तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है?"

-"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता, सब मनुष्य को ही करना पड़ता है।
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न! तो बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या? सब पांडवों को ही करना पड़ा न? यही प्रकृति का संविधान है। युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से। यही परम सत्य है।"

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे। उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी। उन्होंने कहा- चलो कृष्ण! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है, कल सम्भवतः चले जाना हो... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण!"

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले, पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है।

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संघर्ष

संतती लायक असेल तर कमवून ठेवण्याची काहीच गरज नाही, कारण ते स्वतः कमविल्याशिवाय रहाणार नाहीत.

आणि संतती नालायक असेल, तर अजिबात कमवून ठेवण्याची गरज नाही. कारण आपल्या समोरच त्या संपत्तीला  काडी लावल्याशिवाय रहाणार नाहीत.

 विठ्ठलपंत आणि रूक्मिणी मातेने देहांत शिक्षा घेतली, त्यावेळी निवृत्ती , ज्ञानदेव, सोपान व मुक्ताई यांचे वय काय होते? त्या वयात निर्माण झालेली जबाबदारी विश्वाचे कल्याण करणारी ठरली.

 छत्रपती शिवरायांच्या हातात त्यांच्या चौदाव्या वर्षी पुणे जहांगीर सोपवली गेली.

शहाजी राजांनी वयाच्या पाचव्या वर्षी इंदापूर जहांगीर सांभाळली.

जबाबदारी जेवढ्या लहान वयात अंगावर पडते, तेवढे कर्तृत्व महान होते. म्हणून आपल्या मुलांना जबाबदारी घ्यायला शिकवा आणि त्यांना स्वतःच्या पायावर उभे करा.

संघर्ष:
आजकालच्या मुलांना झाडावर चढून फळे काढता येत नाहीत, साधे घरातील माळ्यावर ठेवलेली वस्तुसुद्धा काढायला घाबरतात. उंच जागी चढतांना आईच्याकडून धीर मिळत नाही. तर "पडशील", "घसरशील", "तुला जमणार नाही", "उतर, कुणालातरी बोलावून करूया", असे शब्द ऐकायला मिळतात.
     या मुलांच्या आया आणि बाप, मुले मोठी झाली तरी मुलांच्या शाळेची बॅग शाळेला जाणाऱ्या रिक्षा किंवा व्हॅनमध्ये पोहोचवून देतात, हे पाहिल्यावर मुलांची किव येते.
      आज सत्तरी ओलांडलेल्या आई वडिलांनी मुलांना संघर्ष शिकवला, परंतू तीच मुले आपल्या मुलांना तसा संघर्ष का शिकवत नाहीत, याचे नवल वाटते?
      पाश्चिमात्य देशात मुले आपली सायकल (पंक्चर इ.) स्वतः दुरूस्त करतात, त्यांच्याकडे त्याचे किट असते. यात सर्व हत्यारे असतात, ज्याचा वापर मुले अगदी सहजतेने करतात.
     नवीन पिढीतील मुलांना स्वावलंबी करणे, हेच खरे पालकत्व आहे. त्यांना शर्टाचे किंवा ड्रेसचे बटन लावणे, इस्त्री करणे, आपापले कपडे धुणे, सकाळी उठल्यावर स्वतःची चादर घडी करून योग्य ठिकाणी ठेवणे, पुस्तकांना कव्हर लावणे, बूट पॉलिश करणे, सर्व चप्पल-बूट जोड नीट एक रेषेत ठेवणे, वेळप्रसंगी भांडी धुणे, कचरा साफ करणे हे आलेच पाहिजे. लाड खाण्यापिण्याचे करा, कामात लाड वर्ज्य आहे.
      स्वयंपाक खोलीत त्यांना मदतीला आवर्जून बोलवा, आठवड्यातून एकदा आई वडिलांच्यासाठी चहा बनवायला सांगा. दोन कप चहासाठी किती चहा, साखर व दुध लागते याचा अंदाज स्वतः केल्याशिवाय त्यांना कधीच येणार नाही. हे करताना बऱ्याच वेळेस चटका ही लागतो, लागू दे! ही जखम दोन दिवसांची असते, पण आयुष्यभराची शिकवण देऊन जाते. या व अश्या कामातून मुलांना जबाबदारी घेण्याची सवय होते, तसेच ही कामे खालच्या दर्जाची नसतात हे ही समजते.
      आजकाल एक वाक्य नेहेमी ऐकण्यात येते, "मला जे कष्ट करावे लागले ते माझ्या मुलांना करायला लागू नयेत"

     विचार करावा, आपण चुकीच्या मार्गाने तर जात नाही ना?


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Tuesday, May 21, 2019

Good Thoughts L


समजायला लागलयं

आयुष्यातल्या प्रत्येक टप्प्यावर जे जे मला दुखवत गेले त्या त्या सगळ्यांना न दुखावता सोडून देणं आताशा मला जमायला लागलयं.......

संघर्षाच्या किंवा वादविवादाच्या क्षणी वाद न घालता तेथून दूर निघून जाण्यातच खरी परिपक्वता असते.
माझ्या बरोबर ‍‍‌घडणाऱ्या अनेक वाईट गोष्टींचा उहापोह करून त्यात शक्ती खर्ची घालून आजूबाजूला जे जे उत्तम आहे त्याकडे बघण्याचा दृष्टिकोनच बदलून जातोय हे जाणवायला लागलयं....

आलेल्या अनुभवांतून बाहेर पडत स्वतःला सावरून, शिकून मोठं होणं जमायला लागलय.... कोणत्याही न पटणाऱ्या गोष्टींवर काहीही न बोलणे म्हणजे त्यांना संमती असणे गरजेचे नाही .कधी-कधी काहीही न बोलणं किंवा कोणतही प्रत्युत्तर न देणं...खूप काही बोलून जाते.

आपण लोकांवर किंवा त्यांच्या विचारांवर बंधन आणू शकत नाही पण आपण स्वतःच्या मनावर मात्र बांध घालू शकतो. आपण अशा लोकांच्या वागण्याला किती मनावर घ्यायचे, त्यांना किती महत्त्व द्यायचं, त्यांनी बोललेल्या वाईट साईट गोष्टी किती डोक्यात साठवून ठेवायच्या आणि स्वतःचे आयुष्य खराब करून घ्यायचं हे ठरवणं गरजेचं असतं.  बऱ्याचदा असे वागणारे किंवा बोलणारे लोक दुसऱ्याबद्दल वाईट बोलताना स्वतःचा हीन दर्जा ही दाखवून देत असतात.  अशा लोकांच्या आधारहीन शब्दांची आताशा मन मजा घ्यायला लागलंय........

कधीकधी परिस्थितीला आहे तसंच सोडून देणं आणि शांत राहणं सोईचं ठरतं. लोकांना कुठल्याही गोष्टींचं स्पष्टीकरण देत बसणं आणि त्यांनी तुम्हाला समजून घेण्याची अपेक्षा करणं बावळटपणाचं आहे हे कळल्यावर मी आताशा मला त्या द्रुष्टीनं घडवायला लागलोयं.....

मी इतके दिवस ज्याचा प्रकर्षांने शोध घेत होतो ती मनःशांती, समाधान मला मिळालं जेव्हा ठरवलं की मी अशा लोकांपासून लांब राहावे, जे मला चांगलं म्हणत नाहीत. कारण त्यांच्या दृष्टीने मी जर चांगला नाही  तर मी स्वतःला त्यांच्या साच्यात बसवणे योग्य नाही. कुठलेही वादविवाद किंवा भावना नसलेले संबंध मला नको आहेत.  समोर दुसऱ्याला चांगलं म्हणून मागे वाईट वागणार, बोलणार् या  वरवर संबंध ठेवणार्या  लोकांना आता मी कटाक्षाने दूर ठेवायला हवं हे पटायला लागलंय....

माझ्या स्वतः च्या आनंदाचा ठेवा मला सापडलायं आणि उशीरा का होईना पण मी आताशा त्या वाटेवर समाधानानं पावलं टाकायला लागलोयं.......
आताशा मला समजायला लागलयं हळूहळू.....

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मरावे कसे

खांदेकरी ‌ शिव्या देणार नाहीत तिरडी उचलताना,
इतपत वजन मर्यादित ठेवावे.

सरणावर ठेवताच जळायला मदत व्हावी,
म्हणून थोडी चरबीही असायला हरकत नाही अंगात.

पूर्णपणे जळून झाल्यावर उरणारी दोन -अडीच किलो वजनाची हाडे,
काही काळाने पंचमहाभूतांत विलीन होऊन जाणार आहेत,
त्यामुळे मेल्यावर आपले काही मागे राहील,
या भ्रमात राहण्याचा मूर्खपणा करू नये .

दफन झाले तर कीड्यामुंग्यांना मेजवानी आणि
झाडांना दर्जेदार खत मिळणार आहे,
शिवाय शरीरातला काही भाग,
सल्फर आणि कार्बनच्या स्वरूपात,
पंचमहाभूतात विलीन होणार आहे,
ही माहितीसुद्धा हाताशी असू द्यावी.

बँकेत एवढाच बॅलन्स असू द्यावा,
ज्यामुळे वारसांमध्ये भांडणे लागणार नाहीत,
मुले एकमेकांच्या जीवावर उठणार नाहीत,
सेवाभावी संस्था मागे लागणार नाहीत,
८० - जी चे प्रमाणपत्र घेऊन !

आणि असलीच थोडी प्रॉपर्टी तर,
मृत्युपत्र करताना मुलाच्या नावे करण्याऐवजी,
नातवाच्या नावे करावी,
म्हणजे नातू सज्ञान होईपर्यंत,
आपला नालायक मुलगा आपल्याला शिव्या देत,
शेवटच्या क्षणी पाणी पाजल्याचा पश्चात्ताप करीत,
रोज आपली आठवण काढत राहील.

स्वत:च्या अंत्ययात्रेच्या वेळी बऱ्या - वाईट आठवणींच्या क्षणांची नोंदवही
जाता जाता हळूच,
परमेश्वराच्या रद्दीच्या दुकानात टाकून पुढे सटकावे.

जन्माला का आलो आणि का मेलो,
यासारखे प्रश्न 'राम बोलो' च्या डस्टरने पुसून टाकावे
मनाच्या पाटीवरून.

गल्लोगल्ली श्रद्धांजलीचे फलक लावण्यासाठी
आणि वृत्तपत्रात जाहिराती देण्यासाठी मित्रांना भुर्दंड पडेल,
इतकी कीर्ती मिळवू नये.
पुतळ्याचेही स्वप्न बाळगू नये.
कारण कार्यकर्ते करतील त्याही निधीत भ्रष्टाचार
आणि कावळ्यांना मिळेल सार्वजनिक कमोड !

मरताना डोळे मिटलेले असावे,
स्वतःच्या निधनाच्या चुकीच्या बातम्या वाचायला मिळू नयेत,
म्हणून आणि तोंड उघडे असू द्यावे
सांगायचे बरेच काही राहून गेले पण
ऐकून घेण्यासाठी कुणाकडेच वेळ नव्हता म्हणून.

महागुंगीच्या धुक्यात शिरताना,
समोर तो स्टेशनमास्तर भेटावा,
त्याच्याकडे चौकशी करावी
'पुष्पक विमान' कोणत्या प्लॅटफॉर्मला लागते याची
आणि वैकुंठाचे तिकीट काढून
वाट पाहत बसावे तुकारामाचे गाणे म्हणतः

आम्ही जातो अमुच्या गावा, अमुचा राम राम घ्यावा !

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शब्द का प्रयोग

18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को
80 वर्ष जैसा कर दिया था...

शारीरिक रूप से भी
और मानसिक रूप से भी

शहर में चारों तरफ़
विधवाओं का बाहुल्य था..

पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था ।

अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में
निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।

तभी,

श्रीकृष्ण
कक्ष में दाखिल होते हैं

द्रौपदी
कृष्ण को देखते ही
दौड़कर उनसे लिपट जाती है ...
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं

थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके
समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।

द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??

ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !

वह हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है..

तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दु:शासन ही नहीं,
सारे कौरव समाप्त हो गए

तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !

द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।

द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?

कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो...

लेकिन,

तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

तुम बहुत कुछ कर सकती थी

कृष्ण : जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ...
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !

इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया...
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।

और

उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया...
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।

वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता...

तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।

हमारे  शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं द्रोपदी...

और, हमें

अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है...
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं... अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है...
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है...

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।

ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे,
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

क्योंकी महाभारत हमारे अंदर ही छीपा हुआ है ।

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एक अनामिक हुरहुर

कोणालाच जीवनाच्या कोणत्या वळणावर आपली कोणाशी गाठभेट होणार आहे याची पूर्वकल्पना नसते. प्रत्येकाशी आपलं रक्ताचं नातं असू शकत नाही म्हणून ईश्वरी कृपेने काही माणसं अद्भुतरित्या आपल्या जवळ येतात जसं की नदीच्या प्रवाहात वाहताना दोन ओंडके अचानक एकत्र येतात. सोबत कुठपर्यंत असेल ते काहीच निश्चित नाही पण काही काळ एकत्र प्रवास होऊन पुढे वेळ आल्यावर विलग होतात... एक अनामिक हुरहुर मागे ठेऊन ! अशी नाती खरंच अद्भुत असतात !!!

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प्रत्येक व्यक्तीला महत्व असतं

पंगतीत मीठ वाढणारा परत येत नाही तसच काही माणसं देखील आयुष्यातून एकदा निघून गेले की परत येत नाहीत. बहुदा ते गेल्यावरच त्यांची किंमत कळते.
का घडतं असं?

मिठाचं महत्व जेव्हा पानात असतं तेव्हा कळतच नाही. कारण त्यावेळी माणसाचं लक्ष पानात येणाऱ्या गोड पदार्थावर असतं. तो पदार्थ कुठला, कसा, त्याची चव कशी, तो चांगल्या तुपापासून बनवलाय का? ते खाऊन आपल्याला काही त्रास होऊ शकतो का? हे काहीच माहीत नसतं तरी देखील तो गोड पदार्थ हवासा असतो. कारण मोह. असं म्हणतात की संकट हे नेहमी सुंदर रूप घेऊनच येतं.

त्या गोड पदार्थाच्या मोहापायी ताटातल्या मिठाकडे जराही लक्ष जात नाही. कारण आपण त्याला कुठेतरी गृहीत धरायला लागतो.  त्याचा खारटपणा नकोसा वाटतो. ते आपल्या पानातील इतर पदार्थात मिक्स होऊ नये म्हणून आपणच त्याला स्वतःहून बाजूला करतो.  त्यात कधी वाटीतील रस्सा भाजी वगैरे सांडली तर ते पानात असून देखील उपयोग नसतो.

नको वाटतात ना आपल्या आयुष्यात अशी मिठासारखी माणसं? कारण ती तुमच्या चांगल्यासाठी सल्ला देतात, कधी हक्काने कान धरतात तर कधी पोटतिडकीने  समजावून सांगतात. नकोच वाटतात,  कारण त्यावेळी गोड पदार्थाची झिंग चढलेली असते.  त्याशिवाय पानातील इतर पदार्थ दिसत नाही तर वाटीमागे असलेलं ते एवुढंस मीठ काय दिसणार ना? पण जेव्हा तोच गोड पदार्थ खाऊन तड लागते ना तेव्हा पाण्याच्या ग्लास मध्ये लिंबाची फोड पिळली जाते आणि हात आपसूक मीठ शोधायला लागतो. कारण त्याशिवाय खाल्लेलं अन्न पचणार कसं?

म्हणून देवाने वाढलेल्या ह्या आयुष्यरूपी पानात प्रत्येक व्यक्तीला महत्व असतं आणि ते द्यावं.  आपल्याला ती व्यक्ती आवडो की न आवडो ती आयुष्यात आलीय ना म्हणजे नक्कीच मागील जन्माचा संबंध असतो आणि मिठासारखी माणसं तर नक्कीच ओळखावी भलेही ती तुमच्या आयुष्यात फार महत्वाचे नसतीलही पण निदान वाईट तर करणार नाहीत ना? ...


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Friday, January 18, 2019

Good Thoughts K

Invisible Labels

A car ahead was moving like a turtle and not giving me way inspite of my continuous honking! I was on brink of losing my cool when I noticed the small sticker on the car’s rear!

“Physically challenged; Please be patient.”

And that changed everything!! I immediately went calm & slowed down!! In fact I got a little protective of the car & the driver!!! I reached work a few minutes late, but it was ok!

And then it struck me.  Would I have been patient if there was no sticker!???! Why do we need stickers to be patient with people!??

Will we be more patient & kind with others if people had labels pasted on their foreheads??
Labels like ——
“ Lost my job” , “Fighting cancer”, “Going through a divorce” , “ Suffering Emotional abuse “ , "Lost a loved one”, “Feeling worthless” , “ Financially messed up”..... and more like these!!!!

Everyone is fighting a battle we know nothing about. The least we can do is be patient & kind!!!

Let us respect the invisible labels!!!

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Two Monks and a Woman - a Zen Lesson:

A senior monk and a junior monk were traveling together. At one point, they came to a river with a strong current. As the monks were preparing to cross the river, they saw a very young and beautiful woman also attempting to cross. The young woman asked if they could help her cross to the other side.

The two monks glanced at one another because they had taken vows not to touch a woman.

Then, without a word, the older monk picked up the woman, carried her across the river, placed her gently on the other side, and carried on his
journey.

The younger monk couldn’t believe what had just happened. After rejoining his companion, he was speechless, and an hour passed without a word between them.

Two more hours passed, then three, finally the younger monk could contain himself any longer, and blurted out “As monks, we are not permitted a woman, how could you then carry that woman on your shoulders?”

The older monk looked at him and replied, “Brother, I set her down on the other side of the river, why are you still carrying her?”```



This simple Zen story has a beautiful message about living in the present moment. How often do we carry around past hurts, holding onto resentments when the only person we are really hurting is ourselves.

We all go through times in life when other people say things or behave in a way that is hurtful towards us. We can chose to ruminate over past actions or events, but it will ultimately weigh us down and sap our energy.

Instead we can choose to let go of what doesn’t serve us anymore and concentrate on the present moment. Until we can find a level of peace and happiness in the present circumstances of our lives, we will never be content, because ‘now’ is all we will ever have.

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Beautiful poem by Mario de Andrade:
For friends aged 40 and over -

I counted my years
And realized that I have
Less time to live by,
Than I have lived so far.

I feel like a child who won a pack of candies: at first he ate them with pleasure
But when he realized that there was little left, he began to taste them intensely.

I have no time for endless meetings
where the statutes, rules, procedures & internal regulations are discussed,
knowing that nothing will be done.

I no longer have the patience
To stand absurd people who,
despite their chronological age,
have not grown up.

My time is too short:
I want the essence,
my spirit is in a hurry.
I do not have much candy
In the package anymore.

I want to live next to humans,
very realistic people who know
How to laugh at their mistakes,
Who are not inflated by their own triumphs
And who take responsibility for their actions.
In this way, human dignity is defended
and we live in truth and honesty.

It is the essentials that make life useful.
I want to surround myself with people
who know how to touch the hearts of those whom hard strokes of life
have learned to grow with sweet touches of the soul.

Yes, I'm in a hurry.
I'm in a hurry to live with the intensity that only maturity can give.
I do not intend to waste any of the remaining desserts.

I am sure they will be exquisite,
much more than those eaten so far.
My goal is to reach the end satisfied
and at peace with my loved ones and my conscience.

We have two lives
And the second begins when you realize you only have one.

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Be Contended

1. No matter how beautiful and handsome you're just remember...
 Baboon and Gorillas also attract tourists .

✌Stop Boasting✌


2. No matter how big and strong you are,
 you will not carry yourself to your Grave .

✌Be Humble✌

3. No matter how tall you are,
you can never see tomorrow.

 ✌Be Patient✌


4. No matter how Light Skinned you are,
you will always need light in Darkness ✌

✌Take Caution ✌


5. No matter how Rich and many Cars you have,
you will always Walk to Bed

✌Be   Contented✌

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नेमका प्रॉब्लेम शोधला पाहिजे  !

थकवा असा सहज येत नाही. त्याचं कर्जासारखं आहे. कर्ज घेणं गैर नाही, पण ते वेळेवर फेडावं लागतं, नाहीतर माणूस त्या व्याजातच बुडतो आणि कर्जबाजारी होतो. थकव्यातही तसंच घडतं. शरीराचा, मनाचा, बुद्धिमत्तेचा वापर आपण करतो, तिला वेळच्या वेळी पोषण दिलं, विश्रांती दिली, उत्तम विसावा दिला तर तिची झीज भरून निघते. जर ते केलं नाही तर थकवा जात नाहीच, उलट वाढतच जातो.

‘थकवा येणं’ बंद करता येणार नाही. पण, ज्यांची शारीरिक,मानसिक क्षमता उत्तम आहे, अशांना थकव्याचा प्रतिकार करता येतो. पण आजकाल असं दिसतं की, आपण ही क्षमताच वाढवत नाही. योग्य आहार-योग्य विहार आणि योग्य व्यायाम यापासून आपल्यापैकी अनेकजण शेकडो मैल लांब आहेत. सुधारणा होणार कशी?

अगदी शंभर वर्षांपूर्वीच्या काळात जायला नको. पण, साधारण २५ वर्षं मागं जाऊन पाहू. स्वयंपाक घरात यंत्रं नव्हती. ताक करताना रवी वापरली जात असे, पाटा-वरवंटा रोजच्या वापरात होता, शेंगादाण्यांचा कूट किंवा चटण्या मिक्सरमध्ये होत नसत. खलबत्ता सर्रास वापरला जात होता. लोणची, पापड, मसाले उन्हाळ्यात घरोघरी होत असत, घरातल्या बायका या गोष्टी स्वत: लक्ष घालून करत असत. शारीरिक कष्ट होत असत, पण आहाराचा दर्जा उत्तम होता. हाॅटेलात जाऊन जेवणं किंवा ऊठसूठ बाहेरचं खाणं हे उडाणटप्पूपणाचं लक्षण समजलं जात होतं. त्यामुळे, खाण्या-पिण्याची तंत्रं टिकून होती.

गरीब असो किंवा श्रीमंत, कोणत्याही घरी गेलात की तांब्या-पितळेची भांडी असायची. आमटीची कढई लोखंडाची असायची. डायनिंग टेबलाची पद्धत नव्हती. खाली मांडी घालून जेवायला बसत असत. काट्या-चमच्यानं जेवत नसत. जवळपास घरोघरी दुधदुभतं भरपूर होतं. दूध, ताक, लोणी, घरचं कढवलेलं शुद्ध तूप हे पदार्थ मुबलक प्रमाणात आहारात होते. बेकरीच्या पदार्थांना स्वयंपाकघरात मज्जाव होता. स्वयंपाकाकरिता घाण्याचं तेल वापरलं जायचं. चार-चार दिवसांचं शिळं अन्न घरात ठेवण्याची रित नव्हती. पण आता घरोघरी फ्रिज ओसंडून वाहत असतात.

मेतकूट-तिखट लावलेला कच्चा चिवडा, कच्चे किंवा भाजके शेंगदाणे, फुटाणे, वाटाणे असं खाणं अगदी सहज व्हायचं. प्रत्येक पदार्थाचा एक विशिष्ट सीझन होता. तेव्हाच तो पदार्थ घरी व्हायचा. अक्षय्यतृतीयेच्या आधी आंब्याला हातसुद्धा लावू देत नसत आणि पहिला पाऊस पडला की आंबा बंद. पुन्हा नाव काढायचं नाही. गुळांबा आणि साखरांबा हे पदार्थ घरी केलेत असं तर मी गेल्या १५ वर्षांमध्ये पाहिलंच काय, ऐकलंसुद्धा नाही. कैऱ्या, बोरं, आवळे, करवंदं, जांभळं, चिंचा ही फळं भरपूर खाल्ली जात होती. आताची किती मुलं ही फळं भरपूर खातात?

सातवी-आठवीत शिकणाऱ्या मुला-मुलींना काकवी माहित नाही. गव्हाचा चिक माहित नाही. उडदाच्या पापडलाट्या माहित नाहीत. घरात केचप, साॅस, जॅम, मेयाॅनीज, नटेला च्या बाटल्या असतात, पण मधाची बाटली नसते. तूप कढवल्यावर त्याच पातेल्यात केलेला भात आताच्या शाळकरी मुलांना माहितच नाही. दर गुरूवार किंवा शनिवारचा नारळ घरात आला की खोबऱ्याच्या वड्या व्हायच्याच. डबाभरून केल्या तरी चार दिवसांत संपायच्या. मग पुन्हा नवीन करायच्या. हाळीवाचे लाडू, डिंकाचे लाडू असायचे. आता मुलांच्या आहारातून हे पदार्थच गायब झालेत. एकूण कुटुंबातूनच या पदार्थांना गायब करण्यात आलंय. मुंजीतले भिक्षावळीचे लाडू अतिशय पौष्टिक असतात, आता भिक्षावळीतल्या लाडवांपेक्षा भिक्षावळीतल्या साडीलाच महत्व आलंय.

वाॅशिंग मशीन्स नव्हती, कपडे हातानंच घासावे लागत, धुवावे लागत. प्रत्येकजण आपापले कपडे स्वत: धूत असे. ती सवय घराघरात होती. आता मात्र ही सवय नामशेष होत चालली आहे.
माणसं शक्यतो पायी चालत, सायकल वापरत. शाळेत पायी चालत जायचं आणि यायचं, हा शिरस्ता होता. सकाळ-संध्याकाळ ग्लासभर दूध प्यायल्याशिवाय सुटका नसायची. कितीही कंटाळा आला तरीही, मुंज झाल्यावर दररोज संध्या करावीच लागे आणि तिन्हीसांजेला रामरक्षा-भीमरूपी तर अनिवार्य होतं. शक्यतो कुणीच परान्न घेत नसत. प्रवासातही घरची शिदोरी सोबत असायची.

शालेय वयातल्या मुलांचे थकव्याचे प्रश्न तर गंभीर आहेत. पण त्याला कारणंही अनेक आहेत. त्यातली बहुतांश कारणं राहणीमानाशीच संबंधित आहेत. स्वच्छ, सुती आणि सैलसर कपडे वापरणाऱ्या व्यक्ती पहा आणि तंग, चित्रविचित्र रंगाचे,भडक कपडे घालणाऱ्या व्यक्ती पहा. त्यांच्या व्यक्तिमत्वातला फरक सूज्ञांच्या लगेच लक्षात येईल. आता तर शाळांचे गणवेशही चित्रविचित्र रंगांचे आणि मळखाऊ असतात, त्या रंगांमध्ये उत्साही वाटणार तरी कसं?

रोज संध्याकाळी मैदानावर खेळणं व्हायचं. अगदी पावसातही !

रात्री अंगणात किंवा गच्चीवर मुलं एकत्र झोपत असत. रात्रभर जागरणं करण्याची परवानगी नव्हती. जेवणंही रात्री आठाच्या सुमारास उरकलेली असायची. पण, जेवण स्वयंपाकघरातच असायचं. टीव्ही बघत खायची पद्धत नव्हती. आताही जेवणं रात्री आठ वाजता होतात, पण टीव्हीवर पाताळयंत्री बायकांच्या सीरीयल्स पाहत पाहत !

या सगळ्या आयुष्यात आराम असा नव्हताच, पण आनंद मात्र भरपूर होता. एकमेकांना देण्यासाठी माणसांकडे पैसा नव्हता, पण वेळ मात्र भरपूर होता. आता आपल्याकडे वेळच नाही, स्वत:साठीही आणि इतरांसाठीही ! आयुष्यं आताइतकी गतिमान नव्हती, पुष्कळ संथ होती. पण, त्यामुळं थकवा नव्हता. “लवकर निघा, सावकाश जा, सुरक्षित पोहोचा” हे तत्व माणसं दैनंदिन आयुष्यात वापरत होती. आणि त्यामुळंच, त्यांना आयुष्य जगता आलं. आपली आयुष्यं नुसती धावपळ करण्यातच जातायत..! अतिशय मोठ्या महत्वाकांक्षांपासून माणसं स्वत:ला अगदी जाणीवपूर्वक दूर ठेवायची. राहणीमानातला साधेपणा हेही थकव्यापासून दूर असण्याचं एक प्रमुख कारण असावं.

लोकांच्या आयुष्यात एकटेपणा नव्हता. बहुतांश वेळ इतरांबरोबरच जायचा. प्रत्येकाच्या आजूबाजूला माणसांचा वावर असायचा. हेवेदावे, रूसवेफुगवे होते पण त्यातही स्पष्टता होती. कारण काही लपवालपवी करण्यासारखं नव्हतंच. बंद दारं नव्हती. दारांना कुलुपं नव्हती. शेजारी एखादा पदार्थ केला तरी त्यातला वाटीभर घरी यायचाच. त्यात प्रेमही होतं आणि रीतही होती. माणसं सांभाळण्याकडे एकूणच कल होता. त्यामुळं, टार्गेट्स चा ससेमिरा नव्हता. मानसिक अशांतता नव्हती. चिंतेचे भुंगे नव्हते. रात्री शांत झोप लागू शकत होती. भरपूर मित्रमंडळी, स्नेहीसोबती, शेजारी यांच्या सहवासात कठीण परिस्थिती पचवण्याचं बळ अंगी यायचं. धीर यायचा. पण, प्रायव्हसीच्या नादात हे सगळं आपण तोडून टाकलं आणि एकट्यानंच चालायचं ठरवलं. सगळ्या पातळ्यांवर आपण एकटेच लढायला लागलो, थकवा तर येणारच !


आपल्या हातून घडत असलेल्या , प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षपणे होणाऱ्या अनेक चुका यात नमूद करण्याचा प्रयत्न केला आहे.

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